भूजल प्रदूषण

Underwater Pollution

कार्बाइड के रासायनिक ज़हर से प्रदूषित भूमिगत जल की त्रासदी -

यूनियन कार्बाइड कारखाने के ज़हरीले रासायनिक अपशिष्टों के रिसकर जमीन में जाने से इसके आस-पास की बस्तियों का भूजल प्रदूषित हो गया है। सन्-1999 में ग्रीनपीस द्वारा यूनियन कार्बाइड परिसर की मिट्टी और भूजल व आस-पास के इलाकों में किए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार ये इलाके डाई क्लोरो बैंजीन (डी.सी.बी.), ट्राई क्लोरो बैंजीन (टी.सी.बी.) व कार्बन टेट्रा क्लोराईड और अन्य रसायनों तथा पारा व निकल जैसे भारी धातुओं से गम्भीर रूप से प्रदूषित हो चुके है। इसमें यह भी पाया गया था कि यूनियन कार्बाइड परिसर के बाहर की मिट्टी और भूजल भी गम्भीर रूप से प्रदूषित था।

राष्ट्रीय पर्यावरण अभियान्त्रिकी शोध संस्थान (नीरी) की दो रिपोर्टों से भी यूनियन कार्बाइड परिसर के आस-पास के इलाके प्रदूषित होने के प्रमाण मिले हैं। ये इंगित करता है कि ज़्यादा गहराई पर प्रदूषण का स्तर ज़्यादा है। सभी भूजल नमूनों में कम स्तर का प्रदूषण पाया गया। इस रिपार्ट का सारांश रहा कि यूनियन कार्बाइड परिसर में 17% क्षेत्र गम्भीर तौर पर प्रदूषित है, पर भूजल प्रदूषित नहीं है।

ग्रीनपीस (2002) की एक अन्य रिपोर्ट दर्शाती है कि उच्च स्तर पर फैला यह प्रदूषण जिसमें डी.सी.बी., टी.सी.बी. और हैक्सा क्लोरो साई क्लोरो हेक्सेन (एच.सी.एच.) भी मौजूद है। सृष्टि (2002) द्वारा जाँच किए गए पानी के नमूनों में भी ग्रीनपीस द्वारा किए गए जाँचों जैसे ही परिणाम देखने को मिले, जिसमें पानी के नमूनों में कई रसायनों के साथ एच.सी.एच., क्लोरीन युक्त बैंजीन, क्लोरोफॉर्म और डाई क्लोरो मीथेन जैसे रसायन पाए गए।

मध्यप्रदेष प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड (एम.पी.पी.सी.बी.) द्वारा भोपाल के आस-पास और यूनियन कार्बाइड परिसर के आस-पास से लिए गए पानी के नमूनों में आर्गेनोक्लोरीन यौगिक, डी.सी.बी व अन्य कई प्रकार के रसायनों की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) व संयुक्त राज्य पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी (यू.एस.इ.पी.ए.) की दिशा-निर्देशिका में तय किए गए स्तर से ज़्यादा पाया गया। गामा-एच.सी.एच लिंडेन के नाम से भी जाना जाता है और ये अकेले विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) की सन् 1996-2006 की दिशा-निर्देशिका में तय स्तर से 9 गुना ज़्यादा पाया गया। हैक्सा क्लोरो साईक्लोरो हेक्सेन वसा में जमा होने वाला रसायन है जो माँ के दूध, वसा युक्त कोशिकाओं और खून के सीरम में जमा होता है। एच.सी.एच. जिगर, रोग-प्रतिरोध क्षमता और तन्त्रिका-तन्त्र के साथ स्वास्थ्य पर कई तरह से प्रभाव डालता है।

संयुक्त राज्य पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी (यू.एस.इ.पी.ए.) के अनुसार बीटा-एच.सी.एच., एच.सी.एच की तरह ही कैंसर की सम्भावना पैदा करते हैं। एच.सी.एच. और डी.सी.बी भी शरीर में समाहित हो जाते हैं। डी.सी.बी. रसायन मस्तिष्क और श्वसन-तन्त्र को प्रभावित करते हैं। इसके अतिरिक्त अन्तर्राष्ट्रीय कैन्सर शोध एजेंसी (आई.ए.आर.सी.) ने बताया है कि डी.सी.बी कैंसर जनक है अर्थात् इस रसायन से इन्सानों को कैंसर की सम्भावना है और साथ ही यह बच्चों में जन्मजात विकृति भी पैदा करता है। इसी प्रकार ट्राईक्लोरो बैंजीन भी आसानी से मानव शरीर में समाहित हो जाते हैं और इसका ज़हर जिगर, गुर्दों और थायरॉइड ग्रन्थि को प्रभावित करते हैं।

प्रदूषित भूजल पीड़ित इलाकों में पीड़ितों के स्वास्थ्य पर निगरानी के लिए बहुत ही कम काम किया गया है। सृष्टि (2002) द्वारा मिट्टी, पानी और सब्ज़ियों के नमूनों व माँ के दूध में एच.सी.एच., भारी धातुओ का स्तर और घातक आर्गेनिक यौगिकों की जाँच की गई। शोधकर्ताओ द्वारा लिए गए सभी नमूनों में एच.सी.एच. का स्तर नापा गया। विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय-समय पर किए गए अध्ययनों में यूनियन कार्बाइड के पास की बस्तियों के भूजल में कई प्रकार के घातक रसायन पाए गये। जिनमें से 1-2 डाई क्लोरो बैंजीन व 1-4 डाई क्लोरो बैंजीन बच्चों में जन्मजात विकृति पैदा करते हैं। लेकिन इन बस्तियों में सरकार ने बच्चों में जन्मजात विकृति सम्बन्धी कोई भी अध्ययन या आँकड़ा अब तक दर्ज़ नहीं किया है कि इन बस्तियों में जन्मजात-विकृति की दर क्या है ?

केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड (सी.पी.सी.बी.) और सेन्टर फॉर साईन्स एण्ड एनवायरनमेंट (सी.एस.ई.) ने वर्ष-2009 में कार्बाइड के पास के तीन किलोमीटर इलाके में पानी के नमूनों की एक बार फिर जाँच की नमूनों की जाँच में उनको 100 फुट गहराई तक ज़हरीले रसायन और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भारी धातुएँ मिलीं।

वर्ष-2012 में पुनः सेन्टर फॉर साईन्स एण्ड एनवायरनमेंट (सी.एस.ई.) और भारत के उच्चतम न्यायालय के आदेश पर भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान (इण्डियन इन्स्टीट्यूट फॉर टॉक्साकॉलॉजिकल रिसर्च – आय.आय.टी.आर.) द्वारा प्रदूषित भूजल पीड़ित इलाके व यूनियन कार्बाइड परिसर के पास की अन्य बस्तियों से लिए गए पानी के नमूने भी प्रदूषित पाए गए।

इस प्रकार कुल यूनियन कार्बाइड कारखाने के पास रहने वाले 60,000 लोग इस ज़हरीले पानी को अभी भी रोजाना पीने को मजबूर हैं। सरकार द्वारा स्वच्छ जल की जो व्यवस्था की गई है, वह जनसंख्या के मुकाबले नाकाफी है।